भ्रष्टाचार शब्द सुनते ही दिमाग में राजनेता, बड़े अधिकारी या फिर ठेकेदारों की छवि बनती है। लेकिन असल में ये हमारे रोज़मर्रा के छोटे‑छोटे फैसलों तक भी फैल सकता है – जैसे स्कूल फीस में कटौती, ट्रैफ़िक जाम में रश पर पैसे देना या सरकारी फॉर्म भरते समय झुंझटें। अगर आप सोच रहे हैं कि यह सिर्फ दूसरों की समस्या है, तो गलत हैं; हर किसी को कभी‑न-कभी इससे जुड़ना पड़ता है.
सबसे बड़ा कारण है पारदर्शिता की कमी. जब कोई काम खुली बही में नहीं दिखता, तो गुप्त लेन‑देनों का रास्ता आसान हो जाता है। दूसरा, ताकत और अधिकारों का दुरुपयोग – अक्सर उच्च पदस्थ लोग अपना दबाव इस्तेमाल करके खुद को फायदेमंद बना लेते हैं। तीसरा, शिक्षा और जागरूकता की कमी; अगर लोगों को पता नहीं कि उनका हक क्या है, तो वे शोषण के आगे झुक जाते हैं.
पहला कदम: छोटे‑छोटे लेन‑देनों का रिकॉर्ड रखें. चाहे मोबाइल रिचार्ज हो या घर की मरम्मत, बिल और रसीदें संजो कर रखें। दूसरा, ऑनलाइन सेवाओं को अपनाएँ. जब सरकारी काम इंटरनेट से किया जाता है तो घुसपैठ मुश्किल होती है। तीसरा, स्थानीय स्तर पर ‘भ्रष्टाचार विरोधी समूह’ बनाएं – पड़ोस में मिलकर शिकायतें दर्ज करें और सोशल मीडिया पर शेयर करें.
सरकारी संस्थानों को भी अपना हिस्सा निभाना चाहिए. उन्हें नियमित ऑडिट कराना, सार्वजनिक बैठकों (पब्लिक हियरिंग) आयोजित करना और शिकायतों का तेज़ समाधान देना जरूरी है। जब जनता को लगता है कि आवाज सुन ली जा रही है, तो वह कम झिझकता है.
अंत में एक बात याद रखें: भ्रष्टाचार केवल बड़े लोगों की नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का चुनाव है. अगर हम सब छोटे‑छोटे कदम उठाएँ – जैसे सही जानकारी लेना, फर्जी दस्तावेज़ न देना और दूसरों को भी जागरूक करना – तो इस बीमारी को मात देना आसान हो जाएगा.
दक्षिण अफ्रीका की मई 29 चुनावों में राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने 'टिंटस्वालो' नामक काल्पनिक चरित्र के जरिए एएनसी सरकार की प्रगति को उजागर किया। हालांकि, एएनसी ने केवल 40.18 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और खराब सेवा वितरण की वजह से एएनसी को व्यापक असंतोष का सामना करना पड़ा, जिससे मतदाता विपक्षी पार्टियों की ओर झुक गए।