Prabhas का 450 करोड़ का 3-फिल्म डील: Hombale Films संग नया मेगा प्लान

450 करोड़ का डील, तीन बड़ी फिल्में और पैन-इंडिया गेम प्लान

भारतीय सिनेमा में स्टार-स्टूडियो पार्टनरशिप का पैमाना तेजी से बदल रहा है। इसी रफ्तार में एक बड़ा कदम आया है—हॉम्बाले फिल्म्स और Prabhas का तीन-फिल्म डील, जिसकी वैल्यू इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 450 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। ‘KGF’ और ‘कांतारा’ जैसी ब्लॉकबस्टर देने वाले हॉम्बाले ने पैन-इंडिया कंटेंट की अपनी रफ्तार ‘सलार: पार्ट 1 – सीजफायर’ से साबित कर दी थी, और अब यही पार्टनरशिप अगले पांच साल की रिलीज़ कैलेंडर को नया आकार देने जा रही है।

डील में तीन टाइटल शामिल बताए जा रहे हैं—‘सलार पार्ट 2’, ‘ब्रहमराक्षस’ (डायरेक्टर प्रशांत वर्मा) और लोकेश कनगराज की एक नई फिल्म, जो उनकी 10वीं डायरेक्टोरियल होगी और उनके लोकल “सिनेमैटिक यूनिवर्स” से अलग स्टैंडअलोन प्रोजेक्ट मानी जा रही है। ‘सलार पार्ट 2’ के साथ प्रशांत नील अपनी ही दुनिया को आगे बढ़ाएंगे, जबकि ‘ब्रहमराक्षस’ के नाम से साफ है कि टोन डार्क-फैंटेसी/मिथिकल-हॉरर की ओर झुक सकता है—एक ऐसा जोन जिसमें वर्मा ‘हनु- मैन’ और ‘आवे’ जैसी फिल्मों से स्टाइल और टेक-टोंड नैरेटिव के लिए पहचाने जाते हैं। लोकेश कनगराज की फिल्म हाई-ऑक्टेन एक्शन और ग्राउंडेड नैरेटिव का वादा करती है; ‘कैथी’, ‘विक्रम’ और ‘लियो’ के बाद उनकी सिनेमैटिक लैंग्वेज को बड़े स्केल पर देखने की उम्मीद रहेगी।

ये फाइनल लाइन-अप और टाइमलाइन अभी प्रोडक्शन डिटेल्स के हिसाब से फ्लोटिंग हो सकती हैं, लेकिन संकेत साफ हैं—हॉम्बाले अपनी फ्रैंचाइज़ बिल्डिंग स्ट्रैटेजी पर चलते हुए बड़े कैनवास, बड़े बजट और मल्टी-लैंग्वेज डिस्ट्रिब्यूशन के साथ अगले फेज़ में उतर रहा है।

प्रभास ने इस कोलैबोरेशन का कारण भी साफ रखा—क्वालिटी-फर्स्ट एप्रोच। ‘कांतारा’ से लेकर ‘KGF 2’ और ‘सलार पार्ट 1’ तक हॉम्बाले ने टेक, VFX, और वर्ल्ड-बिल्डिंग में कॉम्प्रोमाइज न करने की साख बनाई है। यही भरोसा इस डील की नींव है।

हॉम्बाले का ट्रैक रिकॉर्ड पिछले कुछ साल में अलग जगह खड़ा दिखता है—लगातार बैक-टू-बैक हिट्स, और फिर उसी IP के नेक्स्ट चैप्टर पर फोकस। ‘कांतारा 2’ और ‘KGF 3’ पहले से प्लानिंग बोर्ड पर हैं, जहां से साफ होता है कि स्टूडियो लॉन्ग-टर्म कंटेंट पाइपलाइन पर दांव लगा रहा है।

प्रभास की बात करें तो ‘बाहुबली’ के बाद उनका बॉक्स ऑफिस पुल दक्षिण और उत्तर—दोनों बाजारों में बना हुआ है। हाल की ‘कैल्की 2898 एडी’ ने पैन-इंडिया कलेक्शन की दौड़ में उन्हें फिर फ्रंट-रनर बनाया, और ‘सलार’ की दुनिया ने एक अलग फैनबेस बना दिया। इस तीन-फिल्म डील का मकसद इसी मोमेंटम को स्ट्रक्चर्ड कैलेंडर और शक्तिशाली मार्केटिंग के साथ मल्टिप्लाई करना है।

बिजनेस मॉडल, रिलीज़ कैलेंडर और इंडस्ट्री पर असर

450 करोड़ जैसी रकम आमतौर पर सिर्फ स्टार-फी नहीं होती। ऐसे पैकेज में फिक्स्ड रेम्यूनरेशन, प्रॉफिट शेयरिंग/बैकएंड और परफॉर्मेंस-लिंक्ड ट्रिगर्स शामिल रहते हैं। हॉम्बाले जैसा स्टूडियो बड़े बजट के साथ-साथ नॉन-थिएट्रिकल रेवेन्यू—ओटीटी, सैटेलाइट, म्यूजिक, और ओवरसीज़ डील—से रिस्क बैलेंस करता है। ‘KGF’ और ‘कांतारा’ के बाद ब्रांड वैल्यू इतनी बढ़ी है कि पैन-इंडिया डबिंग और मल्टी-सिटी मार्केटिंग अब बेसलाइन बन चुकी है, एक्सपेरिमेंट नहीं।

इस दीर्घकालिक डील का फायदा शेड्यूलिंग में दिखेगा। स्टार-डायरेक्टर-स्टूडियो तीनों के कैलेंडर सिंक होने से प्री-प्रोडक्शन टाइम कम होता है, VFX और एक्शन डिज़ाइन पहले से लॉक किए जा सकते हैं, और थिएट्रिकल स्लॉट्स पर कब्जा पक्का किया जा सकता है। खासकर त्योहार और नेशनल हॉलीडे फ्रेम—दिवाली, क्रिसमस, ईद—जैसी विंडो को लक्ष्य करना आसान रहता है।

प्रभास की अगली फिल्मों की भी लाइन-अप भारी है, जिससे साफ है कि 2025 से 2029 के बीच लगातार बड़े टाइटल्स थिएटर में आएंगे।

  • ‘द राजा साब’ (डिसेंबर 5, 2025) – मरुथी निर्देशित हॉरर-कॉमेडी-रोमांस, जो टोन में प्रभास की एक अलग साइड दिखा सकती है।
  • ‘फौजी’ (हनु राघवप्पुडी) – पीरियड/वार-ड्रामा टच वाले बड़े स्केल की चर्चा; बजट को लेकर इंडस्ट्री में हाई स्पेंड की अटकलें।
  • ‘स्पिरिट’ (संदीप रेड्डी वांगा) – इंटेंस कैरेक्टर-ड्रिवन एक्शन-ड्रामा की उम्मीद, वांगा की सिग्नेचर ट्रीटमेंट के साथ।
  • ‘कैल्की 2898 एडी’ के सीक्वेल – साइ-फाइ यूनिवर्स का विस्तार, टेक और वर्ल्ड-बिल्डिंग पर फोकस।
  • ‘सलार पार्ट 2’ (प्रशांत नील) – ‘सीजफायर’ के बाद आगे की लड़ाई और पावर-पॉलिटिक्स की कंटिन्यूटी।

इस डील के तीनों प्रोजेक्ट्स इन टाइटल्स के बीच जगह लेंगे। इसका मतलब है कि शूट शेड्यूल को ब्लॉक करने, VFX पाइपलाइन आरक्षित करने और बहुभाषी पोस्ट-प्रोडक्शन पर पहले से निवेश बढ़ेगा। ट्रेड सर्कल का मानना है कि ऐसे क्लस्टर्ड प्लान से क्रू-रिटेंशन और यूनिट-एसेट्स (सेट्स, प्रॉप्स, एक्शन रिग्स) की लागत भी बेहतर तरीके से मैनेज होती है।

जेनर मैपिंग भी दिलचस्प है—एक तरफ विशाल-स्केल एक्शन-ड्रामा (‘सलार पार्ट 2’), दूसरी ओर डार्क-फैंटेसी/मिथिकल (‘ब्रहमराक्षस’), और तीसरी तरफ लोकेश कनगराज का ग्रिटी-एक्शन। यह वैरायटी अलग-अलग टियर के बाजारों—मल्टीप्लेक्स, टियर-2/3 सिंगल स्क्रीन, और ओवरसीज़—सबमें अलग-अलग तरीके से काम करती है।

हॉम्बाले की क्वालिटी-फर्स्ट फिलॉसफी का असर मार्केटिंग पर भी पड़ता है। ‘KGF 2’ ने दिखाया कि लॉन्ग-लीड कैंपेन और साउंड-डिज़ाइन/एक्शन के सिनेमाघर-फ्रेंडली कट्स कैसे वर्ड ऑफ माउथ को तेज करते हैं। ‘कांतारा’ के केस में कंटेंट ने साउथ से हिंदी बेल्ट तक ऑर्गेनिक पुल बनाया। यही प्लेबुक ‘सलार पार्ट 2’ और नई फिल्मों पर भी लागू होगी—रिज़ॉल्यूशन बड़ा, साउंड इमर्सिव, और थिएट्रिकल एक्सपीरियंस फर्स्ट।

अब रिस्क क्या है? मल्टी-प्रोजेक्ट ओवरलैप से डेट क्लैश, पोस्ट-प्रोडक्शन डिले और क्रिएटिव फटीग जैसी चुनौतियां आती हैं। खासकर बड़े VFX-हैवी प्रोजेक्ट्स में रेंडर टाइम और इंटरनेशनल स्टूडियोज़ की स्लॉटिंग एकदम टाइट होती है। इसलिए फेज़्ड शूट, अर्ली प्री-विज़ और पैरलल एडिटिंग आज की जरूरत है—जो हॉम्बाले जैसे स्टूडियो स्ट्रक्चर के साथ संभव है, बशर्ते तारीखों और लॉक्ड-स्क्रिप्ट पर अनुशासन बना रहे।

लोकेश कनगराज की फिल्म का LCU से बाहर होना एक संकेत है कि स्टैंडअलोन इवेंट-फिल्म का फॉर्मेट अब भी वैल्यू रखता है। फ्रैंचाइज़ थकान से बचने का बेहतर तरीका यही है—यूनिवर्स-लिंक्ड और इंडिपेंडेंट फिल्मों का बैलेंस। वहीं, प्रशांत वर्मा की ‘ब्रहमराक्षस’ जैसी टाइटल पॉप-लोर और समकालीन VFX का फ्यूज़न बना सकती है, जो फैमिली-ऑडियंस और यंग-क्राउड—दोनों को एक साथ खींच सकता है।

सबसे बड़ा नतीजा थिएट्रिकल इकोसिस्टम पर पड़ेगा। 2024-25 के बाद कंटेंट सप्लाई स्टेबल रखना एग्ज़िबिटर्स की प्राथमिकता है। ऐसे मेगा-डील्स से बड़े वीकेंड्स लगातार मिलते हैं, और मल्टीप्लेक्स-चेन अपनी स्क्रीन-शेयर प्लानिंग पहले से फाइनल कर पाती हैं। ओटीटी विंडो अब भी अहम है, लेकिन हाई-इम्पैक्ट लॉन्च के लिए सिनेमाघर केंद्रीय बने हुए हैं—खासकर तब जब फिल्में मल्टी-लिंगुअल रिलीज़ और इवेंट-स्केल पर पैकेज की जाएं।

हॉम्बाले की पाइपलाइन (‘KGF 3’, ‘कांतारा 2’) और प्रभास का कैलेंडर मिलकर आने वाले वर्षों का टोन सेट करेंगे। अगर ‘सलार पार्ट 2’ अपेक्षा के मुताबिक रेवेन्यू और रीपीट-व्यूइंग खींचती है, तो बाकी दो फिल्मों के लिए मार्केटिंग और डिस्ट्रिब्यूशन और सरल हो जाएगा। यहां से इंडस्ट्री के लिए सीख यही है—लंबी अवधि की साझेदारियां, टेक और राइटिंग में फ्रंटलोडेड इन्वेस्टमेंट, और डबिंग/डिस्ट्रिब्यूशन को लेकर सेंट्रलाइज्ड प्लान—यही फॉर्मूला अगले चक्र का मानक होगा।

टिप्पणि (17)

  1. Roy Roper
    Roy Roper

    450 cr ka deal? Bhai ye toh ab studio ka budget hai na, star ki fee nahi

  2. Sandesh Gawade
    Sandesh Gawade

    YE TOH BHAARAT KA CINEMA REVOLUTION HAI! KGF ne jo shuru kiya, uska ye natural next step hai. Prabhas ab sirf actor nahi, brand ban gaya hai! Ab koi bhi film uske saath bana raha hai, uski quality ka guarantee hai. Yehi model follow karo, tabhi India global cinema ka leader banega!

  3. MANOJ PAWAR
    MANOJ PAWAR

    Is deal ka asli magic yeh hai ki yeh sirf ek star aur studio ka saath nahi, balki ek ecosystem ka creation hai. Ek hi team, ek hi VFX pipeline, ek hi distribution strategy - yeh sab kuch aligned hai. Isse film banane ka process bhi efficient ho raha hai, aur audience ko bhi consistency mil rahi hai. KGF aur Kantaara ke baad, yeh sab kuch ab expectation ban chuka hai.

  4. Pooja Tyagi
    Pooja Tyagi

    Broooooo!!! This is not just a deal - this is a CINEMATIC EMPIRE being built!!! Prabhas + Hombale = unstoppable force!!! BRAHMARAKSHAS with Prashant Neel??? Are you kidding me??? This is going to be the most terrifying, visually stunning thing ever seen in Indian cinema!!! I’m already booking my tickets for 3 days in advance!!! 😍🔥💥

  5. Kulraj Pooni
    Kulraj Pooni

    Ye sab kuch toh bas ek ‘brand’ banane ka khel hai… Prabhas ko kya pata, film kaise banegi? Bas logo ko ‘star power’ dikhane ka game hai. Aur jab sab kuch ‘brand’ ban jata hai, toh creativity ka kya? Film mein story, emotion, soul… ye sab kahan gaya? Yeh toh factory mein product banane jaisa ho gaya…

  6. Hemant Saini
    Hemant Saini

    Actually, this is the future of Indian cinema - long-term vision, not one-off hits. Hombale isn’t just making movies, they’re building legacy. Prabhas isn’t just acting, he’s becoming a cultural symbol. And the fact that Lokesh’s film is standalone? Brilliant. It keeps the universe fresh. We need more of this - patience, planning, and passion.

  7. Nabamita Das
    Nabamita Das

    Agar VFX aur post-production pe pehle se investment kiya ja raha hai, toh delay ka risk kam hota hai. Aur agar shooting schedule pe discipline hai, toh ye sab possible hai. Yeh sirf paisa nahi, strategy hai. Hombale ne yeh sab prove kar diya hai - KGF, Kantaara, Salar… sab ek hi formula se ban gaye.

  8. chirag chhatbar
    chirag chhatbar

    450 cr? Bhai ye toh bas ek star ki salary hai… aur yeh sab kuch kya hai? Koi bhi film nahi banti, sirf star ke naam pe ek ‘event’ banta hai. Ab toh audience bhi sochne lage hai - kya yeh film hai ya sirf ek ad?

  9. Aman Sharma
    Aman Sharma

    Yeh sab kuch ‘Hollywood’ ki copy hai. Indian cinema ka soul kahan gaya? Koi bhi film mein character development nahi, sirf explosions aur slow-mo shots. Prabhas ek achha actor hai, lekin yeh deal usko ek ‘product’ bana raha hai. Aur Lokesh ka standalone project? Bas ek distraction hai… kisi ko pata hai ki wo kya ban raha hai?

  10. sunil kumar
    sunil kumar

    THIS IS THE BLUEPRINT FOR THE NEXT DECADE OF INDIAN CINEMA! Hombale’s model is not just viable - it’s revolutionary. Fixed compensation + backend equity + performance triggers = sustainable growth. And the multi-language distribution? Genius. This isn’t about money - it’s about building a global Indian cinematic identity. Let’s normalize this. Let’s scale this. Let’s make India the new Hollywood!

  11. Arun Kumar
    Arun Kumar

    450 crore? Bas ek star ki ego hai. Koi bhi film 100 crore ke andar bhi ban sakti hai agar story strong ho. Yeh sab kuch bade budget ka dard hai… aur audience ka bhi dard hai. Jab tak hum apne kahaniyon ko nahi samjhe, yeh sab kuch bas noise hai.

  12. Snehal Patil
    Snehal Patil

    Prabhas ka 450 cr deal? 😭😭 Ab kya hoga? Koi bhi naye actor ka chance nahi hoga… sab kuch ek hi naam pe chal raha hai. Aur yeh ‘Brahmarakshas’? Bas ek horror film ka naam hai… kya yeh ek ‘mythical’ film hai ya sirf ek marketing gimmick? 😒

  13. Vikash Yadav
    Vikash Yadav

    Man, this is the hype train we’ve been waiting for! Prabhas is no longer just a guy in a movie - he’s a phenomenon. Hombale’s playing chess while everyone else is playing checkers. Salar Part 2? Brahmarakshas? Lokesh’s wild card? This ain’t a lineup - this is a cinematic festival waiting to explode. And the best part? No one’s rushing. They’re building. That’s the real flex.

  14. sivagami priya
    sivagami priya

    OMG! I can’t believe this is real!! Prabhas + Hombale = pure magic!! I’m already crying thinking about Brahmarakshas!! 😭💖 This is the best thing to happen to Indian cinema EVER!! I’m telling everyone I know - mark your calendars!! 🎬🔥

  15. Anuj Poudel
    Anuj Poudel

    It’s important to recognize that this model reduces risk for everyone - the exhibitors, the distributors, the crew, and even the audience. When you have predictable, high-quality releases every year, it creates stability. And stability allows creativity to flourish. This isn’t just about money - it’s about creating a sustainable ecosystem where talent can thrive without constant pressure.

  16. Aishwarya George
    Aishwarya George

    The structural advantages here are undeniable. Centralized post-production pipelines, synchronized shooting schedules, and long-term brand alignment reduce inefficiencies that have plagued Indian cinema for decades. The real win is not the budget - it’s the discipline. If Hombale maintains this standard across all three films, they won’t just dominate the box office - they’ll redefine what’s possible.

  17. Vikky Kumar
    Vikky Kumar

    While the financial scale of this arrangement is impressive, one must critically evaluate the cultural implications of such a monopolistic approach to content creation. The homogenization of cinematic expression under a single corporate paradigm inevitably suppresses regional diversity, independent voices, and alternative narrative structures. This is not progress - it is institutionalized aesthetic colonialism disguised as innovation.

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