मलयालम संगीत: केरल की धुनों का आसान परिचय

अगर आप भारतीय साउंड्स में कुछ नया खोजना चाहते हैं तो मलयालम संगीत एकदम सही विकल्प है। ये गाने अक्सर मीठे राग, तेज़ बीट और भावनात्मक लिरिक्स को मिलाते हैं। चाहे फिल्म की पृष्ठभूमि हो या एल्बम, हर ट्रैक में केरल की सांस्कृतिक झलक मिलती है। नीचे हम इसे आसान भाषा में समझेंगे ताकि आप बिना झंझट के अपनी प्लेलिस्ट बना सकें।

इतिहास और विकास

मलयालम संगीत का शुरुआती दौर 1950‑के दशक में फिल्मी साउंडट्रैक से शुरू हुआ। तब से आज तक इसने पारम्परिक नारायन, थॉम्बर और पश्चिमी पॉप के तत्वों को जोड़ा है। 1970‑80 के दशक में एम.एस. बासु और वी.आर. कृष्णा जैसे संगीतकारों ने ध्वनि को और समृद्ध बनाया। उनकी रचनाएँ आज भी रेडियो पर बजती हैं, इसलिए पुरानी क्लासिक सुनना नया अनुभव देता है।

प्रमुख गायक‑गायिका और ट्रेंडिंग गीत

आज के समय में सोनू निक्किल, सियाबोम पादुनेरि, मुझीर हसन जैसे आवाज़ें सबसे ज्यादा सुनी जाती हैं। इनके अलावा इंडी बैंड ‘ड्रॉइड’ और ‘संध्यालोक’ ने इलेक्ट्रॉनिक बीट्स को लोकल लिरिक्स से जोड़कर नया फॉर्मेट बना दिया है। अगर आप तुरंत कुछ सुनना चाहते हैं तो “पुत्रा पुटिन” या “फूला फिशर” जैसे हिट ट्रैक प्ले करें – ये गीत यूट्यूब और स्पॉटिफ़ाई पर बहुत लोकप्रिय हैं।

मलयालम संगीत का एक खास पहलू है ‘फोल्क रॉक’ शैली, जहाँ ड्रम्स के साथ पारम्परिक तालियाँ मिलती हैं। इस स्टाइल को समझना आसान है: गिटार या बास की बेसलाइन पर थापें मारते हुए आप खुद नाच सकते हैं। अक्सर इन ट्रैक्स में फिल्मी प्रेम कहानी या गाँव की जिंदगी दिखती है, जिससे सुनने वाले जुड़ाव महसूस करते हैं।

अगर आप प्लेलिस्ट बनाना चाहते हैं तो कुछ टिप्स याद रखें – पहले अपने मूड के हिसाब से ‘रिलैक्सिंग’ या ‘एजाइल’ चुनें, फिर दो‑तीन लोकप्रिय कलाकारों के गाने जोड़ें और अंत में एक नया इंडी ट्रैक डालें। इससे प्लेयर लगातार नीरस नहीं होगा और आप हर गाना नए अंदाज़ में सुन पाएँगे।

अंत में बताना चाहूँगा कि मलयालम संगीत सिर्फ़ ध्वनि नहीं, बल्कि केरल की संस्कृति का एक हिस्सा है। हर गीत में वहाँ के त्योहारों, समुद्र तटों और हरे‑भरे बागानों की झलक मिलती है। तो अगली बार जब आप नई म्यूज़िक एक्सप्लोर करें, तो इस टैग को ज़रूर फ़ॉलो करें – आपके कान जरूर ख़ुश होंगे।

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